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News Entry# 351747
  
पलपल संवाददाता, जबलपुर. पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर से प्रारंभ होने वाली तीन स्पेशल ट्रेनों को एलएचबी कोच से चलाने का निर्णय लिया गया है. इनमें जबलपुर-पुणे स्पेशल, जबलपुर-अटारी स्पेशल व जबलपुर-बांद्रा टर्मिनस स्पेशल ट्रेन शामिल हैं. इन तीन स्पेशल ट्रेनों के एलएचबी (लिंक हॉफमैन बुश) कोच से चलाने के निर्णय के बाद अब जबलपुर की 6 गाडिय़ां एलएचबी कोच की ट्रेन हो जायेंगी.
बताया जाता है कि रेलवे बोर्ड ने पश्चिम मध्य रेलवे को कई एलएचबी रैक आवंटित किये हैं, जिसमें से पूर्व में जबलपुर-हजरत निजामुद्दीन सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस, जबलपुर-माता वैष्णोदेवी कटरा व जबलपुर-यशवंतपुर एक्सप्रेस को एलएचबी कोच से शुरू किया जा सका है. जिसके बाद अब और नये एलएचबी रैक जबलपुर पहुंच गये हैं, जिसमें से तीन जोड़ी स्पेशल ट्रेनों
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को इन अत्याधुनिक कोच से अगले सप्ताह से प्रारंभ किया जायेगा.
जबलपुर-पुणे, अटारी व बांद्रा टर्मिनस स्पेशल ट्रेन एलएचबी कोच से चलेंगी
पश्चिम मध्य रेल की मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी श्रीमती प्रियंका दीक्षित के मुताबिक जबलपुर-पुणे, जबलपुर-अटारी व जबलपुर बांद्रा टर्मिनस स्पेशल ट्रेनों को एलएचबी कोच से चलाने का निर्णय लिया गया है. जिसके मुताबिक गाड़ी संख्या 01707 जबलपुर-अटारी स्पेशल ट्रेन 21 अगस्त व गाड़ी संख्या 01708 अटारी-जबलपुर स्पेशल ट्रेन 22 अगस्त से नये कोचों से चलेंगी.
यह ट्रेन 18 कोचों से चलेंगी, जबकि गाड़ी संख्या 01706 जबलपुर-बांद्रा टर्मिनस स्पेशल 23 अगस्त से, वापसी में गाड़ी संख्या 01705 बांद्रा टर्मिनस 25 अगस्त से तथा गाड़ी संख्या 01656 जबलपुर-पुणे 26 अगस्त तथा गाड़ी संख्या 01655 पुणे-जबलपुर स्पेशल ट्रेन 28 अगस्त से एलएचबी कोच से चलना शुरू हो जायेंगी.
पुराने कोच की तुलना में नए कोच ज्यादा सुरक्षित
पूर्व में कई ट्रेनों के पटरी से उतरने के बाद भारतीय रेलवे में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए थे, एक तरफ हम बुलेट ट्रेन चलाने की बात करते हैं वहीं एक्सप्रेस ट्रेनों की सुरक्षा में चूक भारतीय रेलवे की कमजोरी को सामने ले आता रहा है. भारत में चलने वाली कई ट्रेनों में पुरानी तकनीक वाले कन्वेशनल कोच लगे हैं, जिसकी वजह से हादसे के दौरान ज्यादा मौतें होती हैं. वैसे इंडियन रेलवे ने इससे छुटकारा पाने के लिए लिंक हॉफमेन बुश (एलएचबी) कोच का निर्माण किया है.
क्या है लिंक हाफमेन बुश
रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन आरडीएसओ) ने तकरीबन 10 साल पहले ऐसे कोच बनाये थे, जो आपस में टकरा न सकें. इन्हें लिंक हॉफमेन बुश (एलएचबी) कोच नाम दिया गया. इन टक्कररोधी कोच का आलमनगर में सफल परीक्षण किया था. उसके बाद कोचों के डिजाइन में सुधार भी किया था. एलएचबी कोचों और सीबीसी कपलिंग होने से ट्रेन के कोचों के पलटने और एक दूसरे पर चढऩे की गुंजाइश नहीं रहती है.
ट्रेनों में लगे होंगेंसीइ कोच तो नहीं जाएंगी जानें
एलएचबी कोच पुराने कन्वेशनल कोच से काफी अलग होते हैं. ये उच्च स्तरीय तकनीक से लैस हैं. इन कोचों में बेहतर एक्जावर का उपयोग किया गया है. जिससे आवाज कम होती है. यानी कि पटरियों पर दौड़ते वक्त अंदर बैठे यात्रियों को ट्रेन के चलने की आवाज बहुत धीमी आती है.
स्टेनलेस स्टील से बने होते हैं डिब्बे, पावर ब्रेक लगे
ये कोच स्टेनलेस स्टील से बने होते हैं, जबकि इंटीरियर डिजाइन एल्यूमीनियम से की जाती है. जिससे कि यह कोच पहले की तुलना में थोड़े हल्के होते हैं. इन कोचों में डिस्क ब्रेक कम समय व कम दूरी में अच्छे ढंग से ब्रेक लगा देते हंै. कोचों में लगे शॉक एक्जार्वर की वजह से झटकों का अनुभव कम होगा.
सीबीसी कपलिंग से डिब्बे एक-दूसरे पर नहीं चढ़ते
एलएचबी डिब्बों में सीबीसी कपलिंग लगाई जाती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर ट्रेन डिरेल भी होती है तो कपलिंग के टूटने की आशंका नहीं होती है, जबकि स्क्रू कपलिंग वाले कोचों के डिरेल होने से उसके टूटने का डर बना रहता है.
टॉयलेट सिस्टम भी होता है बेहतर
कोच की खास चीज कोचों में लगे कंट्रोल्ड डिस्चार्ज टायलेट सिस्टम की वजह से गाड़ी के स्टेशन पर रुकने पर यह ट्रेन के शौचालय के दरवाजों को बंद कर देगी और खड़ी ट्रेन में यात्री शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. ट्रेन के स्टेशन से चलने के बाद 30 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ लेने पर शौचालयों के दरवाजे दुबारा खुल जाएंगे. इससे स्टेशनों में सफाई व्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा.

1 Public Posts - Sun Aug 19, 2018

  

  

  

  

  
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